आदाब

मेरे हिस्से मे और कुछ भी नही.........
कुछ कोरे सफ्फे और बेरंग रौशनाई है........

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

लोकतंत्र


कुछ महीने पहले लिखी एक कविता 

तुम्हारे घरों के कोनों में
बिल थे उन चूहों के
जिन्हें खा गए थे साँप
पर उन बिलों में
नहीं रह पाए साँप भी
साँप होते तो
निकल पड़ते
जब भर जाते कुछ एक बिल
बारिश के दिनों में
दरअसल बचाकर
सबकी नज़र
रहने लगा है वहाँ लोकतंत्र
जिसे न खा सकता है साँप
न बाहर ला सकती है बारिश,
और जो कर रहा है इंतज़ार
उस दिन का जिस दिन हो वह
सबसे अधिक विषैला...!

-स्वप्निल तिवारी

10 टिप्पणियाँ:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

भाई लोकतंत्र के सांप को हम तुम ही तो दूध दे रहे हैं..

Sunil Kumar ने कहा…

अरुण चन्द्र जी से सहमत , मगर एक संपेरा आज आ गया :)

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

कमाल है आज ही तुम्हारी लघुकथा "लोकतंत्र" पढ़ रहा था और अभी तुम्हारी कविता मिल गयी इसी शीर्षक से!!
बिलकुल सही है.. बस ननी पालखीवाला जी की बातें याद आती हैं कि हमने स्वयं को एक वृहत संविधान दिया पर उसे संभालने की सलाहियत नहीं पायी!! अब इसे साँप को दूध पिलाना कहें या पोसना.. भुगतना तो है ही इस विषकीट को!!

Vandana Singh ने कहा…

wooow badhiyaa :)

Sonal Rastogi ने कहा…

कुछ कहने के लिए बाकी नहीं रहा

yogesh dhyani ने कहा…

teekha aur sarthak kataksh.....

Ankit pandey ने कहा…

वाह! बहुत खूब लिखा है आपने! मन की गहराई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! आपकी लेखनी को सलाम.

Deepak Saini ने कहा…

वाह! बहुत खूब

दिगम्बर नासवा ने कहा…

और वो प्रजातंत्र रात केर अँधेरे में निकल कर काटेगा ... और पता भी नहीं चलेगा कब मौत आ गयी ... बहुत शशक्त ल्र्खन ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

kya hashr hoga us din jab vah vishaila ho jayega....yahi soch hai.

sunder sateek abhivyakti.