कुछ महीने पहले लिखी एक कविता
तुम्हारे घरों के कोनों में
बिल थे उन चूहों के
जिन्हें खा गए थे साँप
पर उन बिलों में
नहीं रह पाए साँप भी
साँप होते तो
निकल पड़ते
जब भर जाते कुछ एक बिल
बारिश के दिनों में
दरअसल बचाकर
सबकी नज़र
रहने लगा है वहाँ लोकतंत्र
जिसे न खा सकता है साँप
न बाहर ला सकती है बारिश,
और जो कर रहा है इंतज़ार
उस दिन का जिस दिन हो वह
सबसे अधिक विषैला...!
-स्वप्निल तिवारी
10 टिप्पणियाँ:
भाई लोकतंत्र के सांप को हम तुम ही तो दूध दे रहे हैं..
अरुण चन्द्र जी से सहमत , मगर एक संपेरा आज आ गया :)
कमाल है आज ही तुम्हारी लघुकथा "लोकतंत्र" पढ़ रहा था और अभी तुम्हारी कविता मिल गयी इसी शीर्षक से!!
बिलकुल सही है.. बस ननी पालखीवाला जी की बातें याद आती हैं कि हमने स्वयं को एक वृहत संविधान दिया पर उसे संभालने की सलाहियत नहीं पायी!! अब इसे साँप को दूध पिलाना कहें या पोसना.. भुगतना तो है ही इस विषकीट को!!
wooow badhiyaa :)
कुछ कहने के लिए बाकी नहीं रहा
teekha aur sarthak kataksh.....
वाह! बहुत खूब लिखा है आपने! मन की गहराई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! आपकी लेखनी को सलाम.
वाह! बहुत खूब
और वो प्रजातंत्र रात केर अँधेरे में निकल कर काटेगा ... और पता भी नहीं चलेगा कब मौत आ गयी ... बहुत शशक्त ल्र्खन ...
kya hashr hoga us din jab vah vishaila ho jayega....yahi soch hai.
sunder sateek abhivyakti.
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