आज सुखनवर बहुत अच्छे श्रंखला में विकास शर्मा ‘राज़’ की ग़ज़लें ले कर आया हूँ। विकास ‘लफ्ज़’ पत्रिका के सह-संपादक हैं और इनका पहला ग़ज़ल संग्रह शीघ्र ही आने वाला है। इस बार का लफ्ज़ पत्रिका का गज़ल वाला हिस्सा विकास पर ही केंद्रित है और उन्ही में से कुछ ग़ज़लें विकास जी के आज्ञा से आपके सामने लाया हूँ।
(१)
हवा के साथ यारी हो गयी है
दिए की उम्र लंबी हो गयी है
फक़त ज़ंजीर बदली जा रही थी
मैं समझा था रिहाई हो गयी है
बची है जो धनक* उसका करूँ क्या
तेरी तस्वीर पूरी हो चुकी है
मुझे मंज़िल नज़र आई है जब से
मिरी रफ़्तार धीमी हो गयी है
लगाकर कहकहा भी कुछ न पाया
उदासी और गहरी हो गयी है
क़रीब आ तो गया है चाँद मेरे
मगर हर चीज़ धुंधली हो गयी है
धनक- इन्द्रधनुष
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(2)
मिरा लिक्खा हमेशा काटता है
मुझे उसका ये लहजा काटता है
बहुत हस्सास* होता जा रहा हूँ
ज़रा-सा गम कलेजा काटता है
बहुत दिलकश हो तेरा शहर लेकिन
यहाँ घर का किराया काटता है
हमारी जीत पर क्यों शक है तुमको
अँधेरे को उजाला काटता है
जिसे मैंने पनाहों में रखा था
वही ख़ेमे का रस्सा काटता है
समंदर तक नहीं पहुंचेगा दरिया
इसे रस्ते में सहरा काटता है
उसी लहजे में उससे पेश आओ
मियाँ लोहे को लोहा काटता है
कभी सूरज को तकते रहते थे हम
अब आँखों को सितारा काटता है
उसे जाते हुए रोका नहीं था
मुझे अब तक वो लम्हा काटता है
बराबर हक़ है औरत का फिज़ा पर
उसे भी बंद कमरा काटता है
ज़माना आ गया है ‘राज़’ कैसा
बड़ों की बात बच्चा काटता है
हस्सास- भावुक
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(3)
अगरचे छिन गया रुतबा हमारा
नशा फिर भी नहीं उतरा हमारा
कई मल्लाह खेना चाहते थे
सफ़ीना* इसलिए डूबा हमारा
हम अपनी जात में बिखरे हुए हैं
हुआ है खुद पे फिर हमला हमारा
गनीमत है ज़रा सी रौशनी भी
दिखाई तो दिया साया हमारा
अब उसकी याद भी आती नहीं है
समंदर हो गया उथला हमारा
हम अपनी तिश्नगी* को पी रहे हैं
नदी देखा करे रस्ता हमारा
बहुत आँखें चुराए फिर रहे थे
पर उसने पढ़ लिया चेहरा हमारा
ये रस्ते दश्त* में खुलने हैं इक दिन
इशारा आपने समझा हमारा
सफ़ीना- नाव
तिश्नगी- प्यास
दश्त- वीराना
9 टिप्पणियाँ:
वाह.बहुत दिलकश ग़ज़लें हैं.. बहुत पसंद आईं.
शानदार ग़ज़ल . आभार .
लफ्ज़ में इन ग़ज़लों को पढ़ कर मैं विकास जी से बात किये बिना न रह सका...बेहतरीन ग़ज़लें कही हैं उन्होंने...उनकी प्रतिभा लाजवाब है...
नीरज
वाह बहुत पसंद आईं ग़ज़लें
कहाँ छिपे है ये मोती सदफ के परदे में... और तुम ढूंढ भी लाते हो उनको समंदर की गहराइयों से.. बेहतरीन शायर है विकास जी.. लफ़्ज़ों का जंजाल नहीं और फ़िक्र की गहराई का कोइ थाह नहीं!!
राज़ जी की बेहतरीन ग़ज़लें पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार, आतिश जी।
भाई, आदमी क्या लिखता है सिर्फ यही उसके लेखकीय सलाहियत का एक मात्र पैमाना नही होता. वो क्या पढ़ता है, क्या दूसरों को पढाता है यह भी मायने रखता है. अदब कि राह में आये हो तो ज़रा ख्याल रखना.
क़रीब आ तो गया है चाँद मेरे
मगर हर चीज़ धुंधली हो गयी है
बहुत हस्सास* होता जा रहा हूँ
ज़रा-सा गम कलेजा काटता है
गनीमत है ज़रा सी रौशनी भी
दिखाई तो दिया साया हमारा
बहुत ही प्रतिभाशाली शायर से रु-ब-रु करवाया है आपने!
उफ्फ ... क्या कमाल लिखा है विकास जी ने ... सभी ग़ज़लें अलग अंदाज़ लिए हैं ...
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