बच्चे खेल रहे थे छुपम छुपाई का खेल
उन्हीं में से कभी किसी ने खोजा होगा इसे अनायास
इस तरह छिपने में भी पैदा हुई होगी एक कला
एक परिचित जगह में उन्होंनें खोज लिए कई अज्ञात दुर्गम कोने
रोज़मर्रा की सपाट दुनिया में भर दिए रहस्य
दरवाज़े की ज़रा सी ओट में या मेज़ कुर्सी पलंग के नीचे
कभी किसी परदे को आड़ बनाते हुए
किसी पौधे के पीछे किताबों के अम्बार के बगल में
कभी माँ की साड़ी की छोर में छिपते हुए
छिपने वाला कभी खोजने वाले की पीठ को ही ओट बना लेता है
अक्सर वह आवाज़ भी देता है कि आ जाओ अब मैं
अच्छी तरह छिप गया हूँ खोजे जाने के लिए तैयार
यह एक संकेत है कि जिसे तुम आसान समझते हो
वह दरअसल काफी कठिन है
और आवाज़ भी एक जगह है जहाँ छिपा सकता है
अपने कुतूहल कल्पना और सहजबुद्धि के सहारे
आगे बढ़ता बच्चा खोज ही लेता है छिपे हुए को
कुछ देर के उहापोह के बाद
वही होता है एक सघन उल्लास का क्षण
जब रहस्य और यथार्थ
चमकदार आँखों से एक दूसरे से टकराते हैं
मैंने देखा है यह छिपने और खोजने का खेल
और जब कोई सुराग पाने की कोशिश में कोई बच्चा
पूछता है कि अपने कहीं देखा मेरी दीदी को
मैं कहता हूँ देखा नहीं
क्योंकि मैं मैं छिपाए रहता खुद को
अपनी खाल के कवच में धूल होते कागजों में खामोशी में
बचता चला आया हूँ यहाँ तक अपमान और अन्याय से
छिपा दूर तक कि यह भांपना कठिन हो कहाँ छिपा हूँ
बहुत दिन हुए खोज नहीं पाया कुछ
गया नहीं किसी अंजान दुर्गम जगह की ओर
छुपम छुपाई खेलते बच्चों से कहता हूँ दौड़ो नहीं
तुम्हें चोट लग सकती है जगह-जगह नुकीले कोने हैं
कहीं कीलें भी निकली हुई हैं
ध्यान रखो आराम से खेलो खोजने का खेल..
6 टिप्पणियाँ:
आपकी रचना तेताला पर भी है आप भी घूमते हुए आइये स्वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/
अच्छी प्रस्तुति।
बहुत ही ख़ूबसूरत रचना छांटकर यहाँ प्रस्तुत की है.. जैनेन्द्र कुमार की कहानी 'खेल' याद हो आई अनायास!!
सही में मोती चुन के लाते हैं आप :)
मानव प्रकृति का सहज रूप से चित्रण मन को बाँधता है..छुपम छुपाई का खेल तो ताउम्र चलता है...
मंगलेश जी की इस अदभुत रचना को पढकर मजा आ गया। आभार।
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तांत्रिक शल्य चिकित्सा!
…ये ब्लॉगिंग की ताकत है...।
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