प्रस्तुत हैं मिथिलेश श्रीवास्तव के काव्य संग्रह "किसी उम्मीद की तरह" से दो कविताएँ
शहर
शहर कभी नहीं मरता है
सिर्फ मैं मरता हूँ
मर कर
पुनर्जीवित होता हूँ
कई बार मरता हूँ
कई बार जन्म लेता हूँ
शहर वैसा ही
वहीं
चाँद के उसी दृश्य हिस्से की ओर
जहाँ छोड़कर मैं मरा था
और पुनर्जीवित हो कर मैंने उसे पाया है
पुनर्जन्मों के बीच शहर के न बदलने पर
कसैला हो जाता है मन
और हर जन्म में
चाँद का एक ही हिस्सा
देखते-देखते
अधीर हो जाता है मन
मेरी मृत्यु से
शहर में कोई परिवर्तन नहीं आया है
न चाँद ने ही बदली है करवट
मैं भी रहा हूँ हर जन्म में
ठीक वैसा का वैसा।
घर में सफेदी
एक गेंद मिली
बच्चा खोज रहा था उसे कई दिनों से
गेंद को हवा में उछालता वह खुश हुआ
पुरानी चिट्ठियों के एक पुलिंदे में
कई चेहरे थे
बहनों की चप्पलों की नाप थी
ऊन के रंगीन नमूने थे
दादा जी के बारे में कोई चिट्ठी नहीं थी
१९४७ के पहले ही वह मर चुके थे
छड़ी की प्रतीक्षा में खुश थे पिता बुढ़ापे में
माँ को कुछ खास कहना नहीं था
अब्बास मियाँ का एक खत था
कठिनाई से उनको मेरा पता मिला था
वे खफ़ा थे खतों के जवाब न मिलने से
उन दिनों की तारीफ थी
जब आबाद खेतों से गुजारकर उनके घर
मैं जाता था
छिपकलियाँ सहमी हुई थीं
कई दिनों तक नहीं दिखीं
कई दिनों तक झींगुर की आवाज़ नहीं आई
अक्सर सन्नाटे में खो जाने वाली सुई मिली
वह भोर में एक दिन खो गयी थी
शहर में जैसे खो जाते हैं
बच्चे पिता और मित्र
कुछ नए चम्मच भी मिले
हम लोग सोचते थे
घर सुनसान पाकर महरी उठा ले गयी होगी
मकड़ी के बड़े-बड़े जले
टूट गए थे
कुछ मकड़ियाँ मारी गयीं
कुछ भाग गयी पड़ोस में
कुछ छिप गयीं दीवार की दरारों में
मकड़ियों को निर्मूल करना आसान नहीं था
कुछ का बचे रहना ज़रूरी था
आदमी में उम्मीद की तरह
एक गुच्छा चाभियों का मिला
कुछ तालों की इस बीच दूसरी चाभियां बन चुकी थीं
कुछ ताले फेंके जा चुके थे
कुछ को जंग खा गया था
कुछ चाभियां थीं जिन्हें हम खोजना नहीं चाहते थे
जिनके मिलने पर हुआ कुछ अफ़सोस।
4 टिप्पणियाँ:
सच ही तो कहा है शहर नहीं बदलते ... वो तो बस पत्थर बनते रहते हैं ... गंभीर रचना ...
gehri baato ki u bayan-e-andazi achhi lagi.
चाभियों के मिलने पर होने वाला अफ़सोस ....हम्म्म्म ... साधारण बिम्बों के साथ असाधारण अर्थ लिए कविताएं
बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|
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