आदाब

मेरे हिस्से मे और कुछ भी नही.........
कुछ कोरे सफ्फे और बेरंग रौशनाई है........

शनिवार, 18 जून 2011

मुकुल उपाध्याय की दो कविताएँ

"सुखनवर बहुत अच्छे" श्रंखला में इस बार एक युवा कवि "मुकुल उपाध्याय की कविताएँ लेकर आया हूँ..मुकुल अल्मोड़ा के रहने वाले हैं लेकिन पिछले कई सालों से दिल्ली में रह रहे हैं और पेशे से कॉपीराइटर हैं... इनकी कविताओं में इनके आस पास के माहौल को सहजता से महसूस किया जा सकता है..एक तरफ अल्मोड़ा भी मिल जाएगा और दूसरी तरफ दिल्ली भी..कहीं ज़िंदगी के सबसे सुन्दर दृश्य दिखा देते हैं और कहीं ऐसी विसंगतियाँ कि बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाए... यहाँ मुकुल की दो कविताएँ लेकर आया हूँ... जिनमें से पहली कविता सबसे उदास क्षणों में भी मुस्कान ले आती है... मुकुल की शेष कविताएँ आप उनके ब्लॉग http://mukulmohamad.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं..

तुम आओ तो



ताल के पानी की तरह

ठहरी थमी सी ज़िन्दगी

कुछ लहरों की आरजुओं में कंकर तलाशती है

तुम आओ कभी खामोश साहिल पर

अपनी तनहाइयों की मुठी भर-भर

मारो मुझ में कंकर पत्थर

एक लहर बिछा दो सीने पर

मार के अपनी एड़ी

कुछ बूँद सजा दो माथे पर

झिड़क के अपनी पायल को

शोर मचा दो साहिल पर

तुम आओ तो कभी

इन सुनसान किनारों पर

ठहरी थमी सी ज़िन्दगी की

रगड़ के अपने पैरों से

पीठ खुजा दो ..बस

तुम आओ तो कभी .........



बाज़ार

हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं
वाह ! इस दौर-ऐ-दिल्ली में अर्थियां भी रेडी मेड मिलती हैं
कफ़न के पीस कटे हुए, फ्री साइज़ सबके लिए
चन्दन, लकड़ी, घी अगरबत्ती, आम की फट्टी
फूल, माला, घाट तक पहुँचाने वाला
कभी भी मरो वक्क्त, बेवक्क्त
यहाँ हर समय तैयार मिलते हैं
भाई सुविधा है मरने की!
बस एक कॉल और फ्री होम डिलवरी.
...................विज्ञापन के इस दौर में
बिकने और बेचे जाने की इस होड़ में
वो दिन भी बस आता होगा
जब हमें बनाने होंगे
अर्थियों के ऑफर एड
एक के साथ एक फ्री
कॉम्बो पैक
फैमली पैक
सोचता हूँ क्या यहीं के लिए निकला था ?
जब घर का ऑगन छूटा था

ऐसा नहीं के मेरे गाँव में लोग नहीं मरते
पर वहां अर्थियों के बाज़ार नहीं लगते.


हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं....

5 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला ने कहा…

दोनो कवितायें बहुत अच्छी लगी। धन्यवाद।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बढ़िया रचना प्रस्तुति....आभार

mahendra verma ने कहा…

ऐसा नहीं के मेरे गाँव में लोग नहीं मरते
पर वहां अर्थियों के बाज़ार नहीं लगते।


हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं ।

आधुनिक संवेदनाहीन समाज की कलई उघाड़ती सशक्त कविता।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब .. दोनो कविताएँ जानदार हैं बहुत ...

vandana ने कहा…

ऐसा नहीं के मेरे गाँव में लोग नहीं मरते
पर वहां अर्थियों के बाज़ार नहीं लगते।
सशक्त रचना ...दोनों कविताएँ अलग मिजाज की लेकिन दोनों ही लाजवाब