मंगलेश डबराल के काव्य संग्रह "आवाज़ भी एक जगह है" से दो कविताएँ
तुम्हारे भीतर
एक स्त्री के कारण तुम्हें मिल गया एक कोना
तुम्हारा भी हुआ इंतज़ार
एक स्त्री के कारण तुम्हें दिखा आकाश
और उसमें उड़ते चिड़ियों का संसार
एक स्त्री के कारण तुम बार बार चकित हुए
तुम्हारी देह नहीं गयी बेकार
एक स्त्री के कारण तुम्हारा रास्ता अँधेरे में नहीं कटा
रौशनी दिखी इधर उधर
एक स्त्री के कारण एक स्त्री
बची रही तुम्हारे भीतर...
कहीं मुझे जाना था
कहीं मुझे जाना था नहीं गया
कुछ मुझे करना था नहीं किया
जिसका इंतज़ार था मुझको वह यहाँ नहीं आया
ख़ुशी का एक गीत मुझे गाना था गाया नहीं गया
यह सब नहीं हुआ तो लंबी तान मुझे सोना था सोया नहीं गया
यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतज़ार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है...
8 टिप्पणियाँ:
इतनी अच्छी कविताएं पढ़वाने का शुक्रिया।
हार्दिक आभार।
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ब्लॉग समीक्षा की 20वीं कड़ी...
आई साइबोर्ग, नैतिकता की धज्जियाँ...
दोनों कविताये बेहद बेहतरीन है
पढवाने के लिए धन्यवाद
पहली कविता स्तब्ध करती है .... बहुत खूब
यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतज़ार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है...
waah, bahut achhi prastuti
दोनों कवितायें एक अलौकिक सुख प्रदान करती हैं!!
बेहतरीन रचनाएं..
Ek alag sa aanand pradan kiya sundar kavita ke dwara aabhar
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