आदाब

मेरे हिस्से मे और कुछ भी नही.........
कुछ कोरे सफ्फे और बेरंग रौशनाई है........

बृहस्पतिवार, 16 जून 2011

मंगलेश डबराल की दो कविताएँ

मंगलेश डबराल के काव्य संग्रह "आवाज़ भी एक जगह है" से दो कविताएँ

तुम्हारे भीतर

एक स्त्री के कारण तुम्हें मिल गया एक कोना
तुम्हारा भी हुआ इंतज़ार

एक स्त्री के कारण तुम्हें दिखा आकाश
और उसमें उड़ते चिड़ियों का संसार

एक स्त्री के कारण तुम बार बार चकित हुए
तुम्हारी देह नहीं गयी बेकार

एक स्त्री के कारण तुम्हारा रास्ता अँधेरे में नहीं कटा
रौशनी दिखी इधर उधर

एक स्त्री के कारण एक स्त्री
बची रही तुम्हारे भीतर...

कहीं मुझे जाना था

कहीं मुझे जाना था नहीं गया
कुछ मुझे करना था नहीं किया
जिसका इंतज़ार था मुझको वह यहाँ नहीं आया
ख़ुशी का एक गीत मुझे गाना था गाया नहीं गया
यह सब नहीं हुआ तो लंबी तान मुझे सोना था सोया नहीं गया
यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतज़ार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है...

8 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार ने कहा…

इतनी अच्छी कविताएं पढ़वाने का शुक्रिया।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

हार्दिक आभार।

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ब्‍लॉग समीक्षा की 20वीं कड़ी...
आई साइबोर्ग, नैतिकता की धज्जियाँ...

Deepak Saini ने कहा…

दोनों कविताये बेहद बेहतरीन है
पढवाने के लिए धन्यवाद

Sonal Rastogi ने कहा…

पहली कविता स्तब्ध करती है .... बहुत खूब

रश्मि प्रभा... ने कहा…

यह सोच-सोचकर कितना सुख मिलता है
न वह जगह कहीं है न वह काम है
न इंतज़ार है न वह गीत है और नींद भी कहीं नहीं है...
waah, bahut achhi prastuti

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

दोनों कवितायें एक अलौकिक सुख प्रदान करती हैं!!

Kailash C Sharma ने कहा…

बेहतरीन रचनाएं..

Amrita Tanmay ने कहा…

Ek alag sa aanand pradan kiya sundar kavita ke dwara aabhar