‘सुखनवर बहुत अच्छे’ श्रंखला में मैं आज के बहुत ही महत्वपूर्ण कवि मंगलेश डबराल को ले कर आया हूँ...एक लंबे अरसे के बाद किसी के लेखन नें मेरे लेखन प्रभावित किया है..इनकी कवितायेँ पढ़कर बहुत बार मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं रहता, इसलिए जनसत्ता में प्रकाशित विष्णु खरे की समीक्षा के कुछ अंश आपके सामने रख रहा हूँ।
मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिन्दा पहलुओं को पकड़कर कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएँ उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहाँ ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्ही शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को हाशिए से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचो बीच लाते हैं। ऐसा नहीं कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, इर्ष्यालू अथवा आत्मदया ग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोजख को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इंकार करता है।
-विष्णु खरे
प्रस्तुत कविता उनके काव्य संग्रह “आवाज़ भी एक जगह है” से ली गयी है और बिलकुल नए धरातल पर लिखी गयी है..कहने का ढंग इतना सरल की वह नया धरातल भी एक दम जाना पहचाना लगता है। प्रस्तुत है उनकी कविता “मंगल”
वहाँ अगर जीवन की सम्भावना थी
तो वह ज़रूर मंगल ग्रह रहा होगा
मैं वहाँ आराम से था अखबार टी वी और टेलीफोन से दूर
मुझे नौकरी पर जाने की हड़बड़ी नहीं थी
बार बार छींक नहीं आती थी सर में दर्द नहीं था
मेरे होने के उद्देश्य के बारे में शंकाएं नहीं थीं
जो मुझे करना था उसे न कर पाने की उब नहीं थी
अस्पतालों के बाहर टूटी हड्डियों वाले बच्चे
और उन्हें दिखा कर भीख मांगती माएं नहीं थीं
उनसे कतरा के निकलने का पश्चाताप नहीं था
वहाँ कोई शत्रु नहीं था युद्ध नहीं था धमकियां नहीं थीं
बल्कि वहाँ हवा थी एक पूरा वायुमंडल प्रकट होने को था
और यह देखने का आश्चर्य बचा हुआ था कि पहली बार पानी कैसे बनता है
कुछ बारीक जीवों और वनस्पतियों के फूटने का आभास था
वहाँ सिर्फ शुरुवात थी और अंत नहीं था
लगातार जन्म की ओर प्रवेश था
पुनर्जन्म नहीं था न उसके कारोबार में लगे लोग थे
मुखौटों त्रिशूलों दाँतों और नाखूनों से भेंट नहीं होती थी
मुस्कुराते फोटो खिंचाते ज़ालिम नहीं थे
बल्कि अगर वहाँ मनुष्य थे तो वे खोजे जाने से बचते थे
अपने को छिपाए रहते थे एक अनिवार्य संकोच में
गोल सुन्दर लाल और अभी अभी
अपनी कक्षा से घूमकर आया वह मंगल ग्रह
जहाँ पृथ्वी की तरह खून से सनी जगहें ढहे हुए घर
और जिन्दा जलाये जाते लोग नहीं थे
पृथ्वी के बहुत पास आया वह
वहीं से किसी निर्मम हाथ ने खींचा मुझे
वहीं से गिरा मैं अपनी जीर्ण शीर्ण देह में..!
-मंगलेश डबराल
5 टिप्पणियाँ:
मंगलेश जी को पढकर एक अलग प्रकार का आनंद आता है। आभार, उनको पढवाने का।
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हॉट मॉडल केली ब्रुक...
यहाँ खुदा है, वहाँ खुदा है...
achchhi post...
ब्लॉग जगत के जिस शख्स ने हमारीवाणी.कॉम का नामकरण किया था उससे पहले उसने ही हमारीअंजुमन.कॉम का भी नामकरण किया था.
धन्यवाद स्वप्निल ,बहुत अच्छी श्रंखला है
धन्यवाद!!! स्वप्निल जी, मंगलेश डबराल को विष्णु खरे की टिप्पणी के साथ पढ़वाने के लिए...
एक ऐसे संसार और समय में जहाँ ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्ही शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को हाशिए से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचो बीच लाते हैं।
सच है!
एक स्वर्गिक अनुभव, एक मांगलिक कविता!!
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