आदाब

मेरे हिस्से मे और कुछ भी नही.........
कुछ कोरे सफ्फे और बेरंग रौशनाई है........

रविवार, 12 जून 2011

परिचित रास्ता-- मिथिलेश श्रीवास्तव

आज से मैं एक श्रृंखला शुरू कर रहा हूँ "सुखनवर बहुत अच्छे"...इसमें मैं अपने पसंद की कुछ कवितायेँ आप सब से बांटना चाहूँगा.. इस श्रृंखला की शुरुवात मैं मिथिलेश श्रीवास्तव की कविता "परिचित रास्ता" से कर रहा हूँ.. मिथिलेश श्रीवास्तव दिल्ली की हिंदी अकादमी के युवा कविता सम्मान से पुरस्कृत कवि हैं.. समाज में रचनाकार और आम पाठक के बीच सार्थक संवाद के मद्देनज़र "लिखावट" नामक कविता और विचार की संस्था के माध्यम से समाज में कविता के प्रसार की कोशिश कर रहे हैं..प्रस्तुत कविता उनके काव्य संग्रह "किसी उम्मीद की तरह" से ली गयी है और मेरी अपनी पसंद है..अपनी पसंद को आप सब तक पहुँचाना चाहता हूँ...

जब घर लौटने में देर होने लगती है
हम सुरक्षित समझकर एक परिचित रास्ता चुनते हैं
लगता है हम जल्दी ज़रूर घर पहुँच जायेंगे
सकुशल घर पहुंचकर हम गहरी नींद सो जाते हैं
हमारे घोड़ों को कोई दूसरा खोल ले जाता है
घोड़ों के जाने की आहटें नींद में नहीं आतीं

परिचित रास्ते पर चलते हुए पिता
बेटियों को उनके घर जल्दी पहुँचता आते हैं
वे इतने थके होते हैं कि भूल जाते हैं
परिचित दुनिया की खौफनाक आवाजें जो
बराबर बेटियों के कानों में बजती रहती हैं

रौशनी में भी हम परिचित रास्ते पर ही चलते हैं
जहाँ हम कोई नई दुनिया नहीं खोज पाते
हम चाहने लगते हैं
कोई वास्कोडिगामा खोज दे हमारे लिए एक नया कोचीन
कोई सिकंदर हमसे हारकर लौट जाए अपने वतन

परिचित रास्ते पर
गिरी हुई बर्फ बहुत खलती है, धूप अधिक जलाती है
क्रांतिकारियों में घर लौटने की इच्छा बलवती हो जाती है

परिचित रास्ते पर
पड़ने वाली नदियाँ बहुत उफनती हैं
कांटे नुकीले चालाक और चुस्त होते हैं..
परिचित रास्तों के दोनों ओर बने आलीशान घरों को
देखकर हम घर बनाने के पचड़ों में पड़ जाते हैं
घर बनाकर घर सजाने में लग जाते हैं

कुछ पुरानी चीज़ें बताती हैं
हम लोग कई पुश्तों से
परिचित रास्ते ही चलते चले आ रहे हैं..

- मिथिलेश श्रीवास्तव

9 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जबरदस्त ... लाजवाब रचना है ... बहुत शशक्त .....

वन्दना ने कहा…

बेहद गहन , सशक्त और उम्दा रचना…………आभार पढवाने के लिये।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

behtareen rachna

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाकई मिथिलेश जी की यह कविता बहुत अच्छी है।

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर कविता है मिथिलेश जी को बधाई और आपका, आभार .....

मनोज कुमार ने कहा…

जाने-पहचाने रास्ते से जाकर अतिरिक्त खतरा न उठाने की संभावना बनी रहती है।
कविता अच्छी लगी।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

परिचित रास्ते बेहद सहज होते हैं जैसे भ्रष्टाचार के बीच हमारा आपका जीवन... कौन करे क्रांति....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

सचमुच, पर कुछ ऐसे लोगभी होते हैं, जो अपरिचित रास्‍तों की ओर बढ जाते हैं, और ऐसे ही लोग आगे चलकर इतिहास लिखते हैं।
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हॉट मॉडल केली ब्रुक...
नदी : एक चिंतन यात्रा।

Kailash C Sharma ने कहा…

कुछ पुरानी चीज़ें बताती हैं
हम लोग कई पुश्तों से
परिचित रास्ते ही चलते चले आ रहे हैं..

सच है सभी परिचित और आसान रास्ता अपनाने की कोशिस करते हैं..लेकिन कुछ सार्थक करने के लिये नए रास्ते पर चलने की आदत भी डालनी होगी..बहुत उम्दा रचना..