आदाब

मेरे हिस्से मे और कुछ भी नही.........
कुछ कोरे सफ्फे और बेरंग रौशनाई है........

सोमवार, 6 जून 2011

आरामकुर्सी

इसकी बनावट अजीब है,

आप नहीं रख सकते इस पर

अपनी पीठ सीधी

न ही आप इसे घुमा सकते हैं

चारो तरफ मनचाहे तरीके से,

एक अरसे तक तक

इस पर बैठने के बाद मैंने पाया कि

मेरी रीढ़ बहुत कमज़ोर हो चुकी है,

पीठ की चमड़ी भी उतरने लगती है

इस पर से उठते ही,

बरसों पहले एक बार

जब मैं बहुत थका हुआ था

मैं प्यार को आरामकुर्सी समझ बैठा था...।

10 टिप्पणियाँ:

Sonal Rastogi ने कहा…

क्या बात ,क्या बात क्या बात .... बेहद pasand aai

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

भाई किसने कह दिया कि प्यार आरामकुर्सी है.... अच्छी कविता...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

क्या बात को मोड़ा है ... लाजवाब ... प्रेम तो सबकुछ है फिर आराम कुर्सी क्यों नही ...

Abhinav Srivastava ने कहा…

वह क्या खूब कहा स्वप्निल... बेहद खूबसूरत रचना !

aanch ने कहा…

:)

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इस पर बैठने के बाद मैंने पाया कि
मेरी रीढ़ बहुत कमज़ोर हो चुकी है,
पीठ की चमड़ी भी उतरने लगती है
इस पर से उठते ही,
बरसों पहले एक बार
जब मैं बहुत थका हुआ था
मैं प्यार को आरामकुर्सी समझ बैठा था...।
pyaar ektarfa ho to aise hi haalat hote hain

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

आज बहुत दिनों बाद वो मुहावरा याद आया है इस नज़्म पर जिसका जुमला हुकूक तुम्हारे नाम महफूज़ है..
कतल है एकदम!! और जो आलाए क़त्ल है वो है आख़िरी लाइन.. गजब का इम्पैक्ट!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

बिलकुल अलग मूड की कविता।

---------
बाबूजी, न लो इतने मज़े...
चलते-चलते बात कहे वह खरी-खरी।

'साहिल' ने कहा…

बहुत खूब! suspense आखिरी में खुलता है!

Vivek Jain ने कहा…

क्या खूब कहा, खूबसूरत रचना
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com