इसकी बनावट अजीब है,
आप नहीं रख सकते इस पर
अपनी पीठ सीधी
न ही आप इसे घुमा सकते हैं
चारो तरफ मनचाहे तरीके से,
एक अरसे तक तक
इस पर बैठने के बाद मैंने पाया कि
मेरी रीढ़ बहुत कमज़ोर हो चुकी है,
पीठ की चमड़ी भी उतरने लगती है
इस पर से उठते ही,
बरसों पहले एक बार
जब मैं बहुत थका हुआ था
मैं प्यार को आरामकुर्सी समझ बैठा था...।
10 टिप्पणियाँ:
क्या बात ,क्या बात क्या बात .... बेहद pasand aai
भाई किसने कह दिया कि प्यार आरामकुर्सी है.... अच्छी कविता...
क्या बात को मोड़ा है ... लाजवाब ... प्रेम तो सबकुछ है फिर आराम कुर्सी क्यों नही ...
वह क्या खूब कहा स्वप्निल... बेहद खूबसूरत रचना !
:)
इस पर बैठने के बाद मैंने पाया कि
मेरी रीढ़ बहुत कमज़ोर हो चुकी है,
पीठ की चमड़ी भी उतरने लगती है
इस पर से उठते ही,
बरसों पहले एक बार
जब मैं बहुत थका हुआ था
मैं प्यार को आरामकुर्सी समझ बैठा था...।
pyaar ektarfa ho to aise hi haalat hote hain
आज बहुत दिनों बाद वो मुहावरा याद आया है इस नज़्म पर जिसका जुमला हुकूक तुम्हारे नाम महफूज़ है..
कतल है एकदम!! और जो आलाए क़त्ल है वो है आख़िरी लाइन.. गजब का इम्पैक्ट!!
बिलकुल अलग मूड की कविता।
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बाबूजी, न लो इतने मज़े...
चलते-चलते बात कहे वह खरी-खरी।
बहुत खूब! suspense आखिरी में खुलता है!
क्या खूब कहा, खूबसूरत रचना
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com
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