तुम्हारे जवाब का मुन्तजिर
मैं बैठा रहा
पर जवाब
गणित के सवाल का तो नही था
जो आ ही जाता,
मैं बैठा रहा फिर भी
रेत घडी को बार बार
उल्टा-सीधा करते हुए
करता रहा इंतज़ार
पर तुम्हारा जवाब
पीपल के पत्ते की नोक पर
अटकी बूँद नहीं था
जो गिर ही आता हथेली पर..
मैं बैठा रहा फिर भी
ये जाने बिना
कि तुमसे प्यार करना
आइडल स्टेटस वालों को
पिंग करने जैसा था..... :D
13 टिप्पणियाँ:
ऐसा क्यों लग रहा है
दिल पे चोट खाई है तो जुबां पर ये नज़्म आई है ?
पुराने रंग में आने के लिए धन्यवाद
ओह्……………बहुत दर्द भर दिया…………क्या बात है।
कि तुमसे प्यार करना
आइडल स्टेटस वालों को
पिंग करने जैसा था.....
या फिर इन्विज़िबल लोगों को पिंग करने जैसा... :D
मैं बैठा रहा फिर भी
ये जाने बिना
कि तुमसे प्यार करना
आइडल स्टेटस वालों को
पिंग करने जैसा था..... :D
dil se nikle shabd , bilkul sachche motee se
अनुपम उपमायें ... रचना अच्छी लगी!
Timed out तो नहीं आया न????? सोनल जी की बात भी जवाब मांगती है.. नज्म का शीर्षक "ज़वाब" कैसे हो गया और नज्म्में भी हर जगह "ज़वाब" ही लिखा है?
इस कविता की सभी घटनाएँ और पात्र काल्पनिक हैं.... इसका किसी जीवित व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं ..और मारे से हो के करेगा भी क्या.. :D ..
नज़्म का उन्वान बस पहचान के लिए रख दिया.... हेहेहे..ऐवें ही
स्वप्निल भाई, आपकी आतिश भीतर तक असर करती है।
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कौमार्य के प्रमाण पत्र की ज़रूरत है?
ब्लॉग समीक्षा का 17वाँ एपीसोड।
एक सुंदर नज़्म जो अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है।
शुरू की पंक्तियाँ गंभीर लगी मगर अंत का 'ping ' ने मूड को लाइट कर दिया..........अच्छी लगी !
मार्डन आर्ट की रवानी है नज़्म में...
:)
jaanleva hai....kasam se !:-) Jiyo Swapnil saa'b
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